इस अगस्त में बच्चों को बचाने के लिए कितना तैयार है गोरखपुर?

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गोरखपुर में एक मां खूब रो रही है, अपना कलेजा पिट रही है क्योंकि उसने अपनी बेटी खोई है. अभी भी नम आंखों से बेटी का बस्ता निहार रही है. उसकी बीटिया करीना अबकी तीसरी में गई थी स्कूल जाने वाली थी लेकिन खुदा की मर्जी कुछ और ही थी.

गोरखपुर का हाल कुछ ठीक है नहीं

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बेटी की याद में उदास मां पुरानी और गंदी साड़ी पहनकर झाड़ू लगा रही है और पिता को पेट चलाने के लिए दिहाड़ी पर जाना पड़ा है.

उस रात करीना ने दाल का पीठा और खीर बड़े चाव से खाया था. लगा नहीं था कि अचानक वो बुखार से तपने लगेगी. करीना अकड़ रही थी, हम संभाल भी नहीं पा रहे थे उसे. करीना उल्टियां करने लगी, झटके मारने लगी. हमलोग जईसे-तईसे ओकरा के ले गईनी ब्लॉक अस्पताल जहां हमलोग के सदर भेज देवल गईल.

करीना का गोरखपुर जिला अस्पताल में 10 दिनों तक इलाज चला जिसके बाद डॉक्टरों ने उसे डिस्चार्ज कर दिया. करीना घर आ गई. करीना के माता-पिता को ये लग रहा था कि उनकी बेटी एकदम ठीक हो गई है. लेकिन अफसोस कि घर आने के अगले ही दिन करीना फिर तपने लगी. उसे फिर सदर ले जाया गया जहां करीना को मेडिकल कॉलेज भेज दिया गया.

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मेडिकल कॉलेज में 4 दिनों तक करीना रही. करीना की मां बताती हैं कि इन 4 दिनों में उन्होंने अपनी बच्ची की हालत जानने के लिए कई बार डॉक्टर्स से पूछा लेकिन उन्हें डांटकर शांत करा दिया जाता था और अंत में जाकर पांचवे दिन उनकी बेटी खत्म हो गई.

वापस घर भेजा नहीं होता करीना जिंदा होती

करीना की मां की बातों का मतलब ये था कि अगर करीना को सदर वालों ने वापस घर भेजा ना होता तो उनकी बेटी जिंदा होती. ये घटना बेहद दुखदायी है. इसके ऊपर सरकार को सोच-विचार करनी चाहिए.

“अगर सदर वालों ने लड़की को घर नहीं भेजा होता तो शायद बच जाती. लेकिन मैंने वहां देखा- बच्चा पूरी तरह ठीक हुआ हो या नहीं, सदर में सबको 10 दिन बाद छुट्टी दे देते थे. हमारी लड़की का इंसेफेलाइटिस पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था तभी तो दोबारा वापस आया.”

दरअसल बीते अगस्त में गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से 72 बच्चों की मौत हो गई थी. सरकार की खूब किरकिरी हुई थी. इस घटना के बाद गोरखपुर में अगस्त का महीना’ और ‘इंसेफेलाइटिस’ से मरने वाले बच्चे’ एक दूसरे के पर्याय के तौर पर जनमानस में स्थापित हो गए.

क्या सरकार तैयार है ?

यूं तो गोरखपुर अंचल में बरसात के दौरान फैलने वाले जापानी इंसेफेलाइटिस (जेइ) और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) नामक दिमाग़ी बुखारों की चपेट में आने वाले बच्चों का सिलसिला 40 साल पुराना है.

लेकिन अगस्त 2017 के ‘ऑक्सीजन कांड’ के बाद सरकारी लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता के चलते राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्ख़ियाँ बटोरने वाली उत्तर प्रदेश सरकार इस साल अगस्त के महीने में पुरानी गलतियां न दोहराने के दावे कर रही है.

वैसे बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इस साल 24 जुलाई 2018 तक जुटाए गए आकंड़ों के अनुसार 196 बच्चे और 57 वयस्क इंसेफेलाइटिस के इलाज के लिए दाख़िल हुए. इसमें से 69 बच्चों और 13 वयस्कों की मृत्यु हो गयी. अगस्त के साथ-साथ बरसात का मौसम यहां शुरू हुआ ही है.  ( आंकड़ें: बीबीसी न्यूज )

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