Impeachment: क्या है महाभियोग प्रस्ताव ? यहां जानें

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कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने आखिरकार CJI मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया है। इसकी जानकारी विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने दी। चीफ जस्टिस दीपक मिक्षा कई दिनों से विवादों में है। प्रेस कांफ्रेंस में कपिल सिब्बल ने कहा कि हमने उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू और राज्यसभा के चेयरमैन से मिलकर जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव दे दिया है। उन्होंने कहा कि ये दिन कभी आना नहीं चाहिए था लेकिन CJI के काम करने के तरीके से हमें ये कदम उठाना पड़ा।

गौरतलब है कि इसी साल की शुरूआत में चार जजों ने प्रेस कांन्फ्रेंस कर मीडिया के सामने कोर्ट में चल रही अनियमितताओं के बारे में बताया था। जाहिर है चारों जज सीधा-सीधा जस्टिस मिक्षा के कामों से नाराज थे। ये चारों जज ( जस्टिस चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ) जस्टिस दीपक मिश्रा के बाद SC के सबसे वरिष्ठ जज हैं।

महाभियोग क्या है ?

महाभियोग का इस्तेमाल राष्ट्रपति और SC या हाई कोर्ट (HC) के जजों को हटाने के लिए किया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 61, 124(4),(5), 217 और 218 में महाभियोग का जिक्र किया गया है। जब संविधान का उल्लंघन या फिर खराब व्यवहार की वजह से महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है। इस प्रस्ताव को संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है।

  • लोकसभा में इस प्रस्ताव को पेश करने के लिए 100 सांसदों के साइन चाहिए। वहीं राज्यसभा में 50 सांसदों के साइन जरूरी है। जिसके बाद सदन के स्पीकर तय करते हैं कि इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया जाए मतलब आगे जांच हो या नहीं। अगर सदन के स्पीकर इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं तो एक समिति बनाकर आरोपों की जांच करवाई जाती है।
  • इस समिति में कुल 3 सदस्य होते हैं। एक सुप्रीम कोर्ट के जज,  दूसरे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और तीसरे एक ऐसे शख्स का चयन किया जाता है, जिन्हें इस मामले के लिए स्पीकर उचित समझें। इस प्रस्ताव को दोनों सदनों में भी पेश किया जा सकता है और अगर ऐसा होता है तो दोनों सदनों के अध्यक्ष एक संयुक्त जांच समिति बनाते हैं।

समिति मामले की जांच करती है और जांच कि रिपोर्ट सदन के स्पीकर को सौंप देती है। समिति द्वारा पेश की गई जांच रिपोर्ट में पदाधिकारी को दोषी पाया जाता है तो सदन में इसके लिए वोटिंग कराई जाती है।  कम से कम दो तिहाई का समर्थन मिलना जरूरी है तभी इसे आगे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। और सभी जानते हैं कि राष्ट्रपति के दस्तखत के बिना किसी भी जज को हटाया नहीं जा सकता है।

जज रामास्वामी भी रहे विवादों में

आपको बता दें कि भारत के इतिहास में अब तक किसी भी जज के खिलाफ महाभियोग लाकर हटाया नहीं जा सका है। हां एक बार साल 1933 में जज वी. रामास्वामी पहले जज थे जिनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया गया था। जज रामास्वामी सुप्रीम कोर्ट के जज थे।          

उस समय जज रामास्वामी के खिलाफ पेश किया गया महाभियोग का प्रस्ताव लोकसभा में पास नहीं हुआ था। लोकसभा में प्रस्ताव को दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया था क्योंकि कांग्रेस ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया था।

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महाभियोग का इस्तेमाल राष्ट्रपति और SC या हाई कोर्ट (HC) के जजों को हटाने के लिए किया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 61, 124(4),(5), 217 और 218 में महाभियोग का जिक्र किया गया है। जब संविधान का उल्लंघन या फिर खराब व्यवहार की वजह से महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है। इस प्रस्ताव को संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है।
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